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Sunday, June 23, 2013

चाँद के साथ- मालिनी गौतम के कुछ कदम


अपने-अपने चाँद ।
अनंत आकाश में स्थित पिण्डों में मनुष्य को यदि किसी ने सर्वाधिक आकर्षित किया है तो वह है चाँद।
मालिनी गौतम गुजरात के एक महाविद्यालय में अंग्रेज़ी पढ़ाती हैं और हिन्दी की अनुरागी हैं। चाँद के साथ चलने-खेलने और बातें करने का मन किसका नहीं  होता ! मालिनी जी की लेखनी ने चाँद को जिस तरह स्पर्श किया है वह प्रस्तुत है आप सबके समक्ष ज्यों का त्यों .....   


चाँद के साथ-1

कल रात वह

फिर चला आया

चाँद की उँगली पकड़े चुपचाप

खिड़की के रास्ते,

मैनें आँखें तरेर कर

चाँद से पूछा

क्यों ले आते हो

तुम इसे बार-बार अपने साथ...?

क्या मैनें तुमसे कहा कभी

कि मुझे अब भी आती है

इसकी याद...?

चादँ हंसकर बोला

कौन कमबख्त इसे लाना चाहता है,

पर जब भी अकेला आता हूँ

मिलती है मुझे

दर्द से तड़पती, तन्हा, आधी-अधूरी,

बिखरी-बिखरी सी इक नज्म....

इसके आने से ही सही

कभी तो पूरी होगी यह नज्म

इसी कशिश में

खुद भी खिंचा चला आता हूँ

और इस नामुराद को भी

साथ ले आता हूँ....

 

2

 आधी रात को

किसी ने हौले से

दस्तक दी..

अधखुली आँखों ने देखा

नीली सी रौशनी

और गालों पर खंजन लिये

चाँद टिका हुआ था

खिड़की में,

बोला.....

कब तक यूँ ही सोती रहोगी..?

थाम लो मुझे

मैं ले जाऊँगा तुम्हें

बादलों के उस पार….

सदियों से खामोश

उस देह ने

इतना सुनते ही

करवट बदल ली

तभी अँधेरा बोल उठा

किससे कर रहे हो बातें..?

लाशें भी क्या कभी बोलती हैं...?
 
 
 
 
तीन

बचपन में झूले पर बिठाकर

घी-शक्कर चुपड़ी रोटी खिलाते-खिलाते

माँ हमेशा कहतीं

जल्दी-जल्दी खा लो

चंदा मामा ने

भेजी है तुम्हारे लिये......

बचपन का वह चाँद

यौवन की दहलीज पर आते-आते

न जाने कब बन गया

मेरा हमदम...मेरा राजदार....

मेरे एकांत का साथी,

न जाने कितनी ही रातों तक

मैं उसे एकटक देख कर जागती रही

और न जाने कितनी ही रातों तक

वह मुझे बहला­-फुसला कर

मुझ पर नींद की चादर उढ़ाता रहा....

 

काली अमावसी रातों में

एक बार उसका इंतजार करते-करते

मैनें देखा फुटपाथ पर

हाथ में थालियाँ लिये

फटेहाल...उदास..पीली सी मुस्कान वाले बच्चों को,

मैनें धीरे से पूछा

क्या तुम भी मेरी तरह कर रहे हो

चाँद का इंतजार...?

वे हँसकर बोले ....हाँ..

हमारे लिये तो

इन थालियों में रखी

गोल-गोल रोटियाँ ही चाँद हैं

बस उसी का इंतजार कर रहे हैं...

 

तभी पास ही झोंपड़ी में रहती

हर रोज अपने शराबी पति

से मार खाती.....कम्मो

ठोड़ी पर हाथ टिकाये

उकड़ु सी बैठी दिखी

मैने कहा...कम्मो..

क्या चाँद निकलने का इंतजार है तुम्हे..?

वह बोली बीबीजी मेरा मरद

अभी तक वापस नहीं आया,

भगवान करे ठीक-ठाक हो,

उसी का इंतजार कर रही हूँ..

मेरे लिये तो मेरे माथे पर चमकती

यह बड़ी सी लाल बिन्दी ही 

मेरा चाँद है....

 

नजदीक ही

चौकीदार की जवान बेटी लाजो

कुछ गुनगुनाते-गुनगुनाते

घर से बाहर निकली

कुछ देर अँधेरे में ताकती रही

फिर मुस्करा कर आगे बढ़ गई

मैने कहा...क्या चाँद ढ़ूढ़ रही हो..?

वह ठठाकर हँस पड़ी

अपने अलसाये से बदन को

मरोड़कर बोली

मैं क्यों करूँ चाँद का इंतजार

खाली-पीली टाईम वेस्ट होता है

और मिलता कुछ भी नहीं

ऐसे तो न जाने कितने ही चाँद

मेरे आगे-पीछे घूमते रहते हैं..

 

मैं थके तन

और उदास मन को लिये

चल दी नजदीक ही

एक खेत की ओर

किसान की लड़की साँवली

धान के खेतों की

रखवाली कर रही थी

तभी चाँद निकल आया

मैनें आँखों में प्यार भरकर कहा

देखो कितना प्यारा चाँद है

साँवली बोली..

ऊपर देखने की फुरसत किसे है...

मेरे धान के हर क्यारे में

एक चाँद चमक रहा है..

मैं हतप्रभ ठगी सी

खड़ी रह गई

सोचा यह भी अजीब है

यहाँ तो किसी को

पड़ी ही नहीं है चाँद की,

एक मैं ही दिवानी हुई पड़ी हूँ

बेकार ही जलती रही

इतने दिनो तक

कि मेरे चाँद को

किसी की नजर न लग जाये.....

Saturday, March 16, 2013

रोशन वर्मा की दो रचनायें

बैसाखी

 

मुझे दे दो

छोटा सा टुकड़ा

कपड़ा,

ज़मीन,

रोटी

या ग़ैरत का,

समय

या हक़ का  ...

अनुपात से।

मैं क्यों करूँ संघर्ष अजायब घर में ?

पीढ़ियों से नहीं सीखा

तुम्हारी बला से।

अब तो आदत सी हो गयी है

खेलने की।

चल रहा है सिलसिला

न जाने कब से,

चलेगा  

न जाने कब तक।

किंतु  

समझ नहीं पाया अभी तक

इस खेल में कौन है खिलौना

मैं

या समय।

   

2-   बन्दी

वह माँ बनी

सौभाग्य!

अनंत ख़ुशियाँ

और

सम्पूर्ण नारीत्व का अहसास ...

क्या सचमुच?

पर

वह तो दुःखी है

लज्जित और गुमसुम भी।

शब्द नहीं हैं

उसके होठों पर

हैं

तो सिर्फ़ दहशत और घृणा

उसके चेहरे पर

चिपके हुये स्थायी भाव से।

आकुल, आहत

और...

विजित...विक्षिप्त सी थी वह

किन्तु जागी

फिर एक दिन

देखा

सबको शोलों भरी आँखों से।

अब

खड़े थे सब

सिर झुकाये हुये ।

उसने एक-एक कर थूका

सबके चेहरों पर ... "किस-किस का नाम लूँ..?"

पहले वह बन्दी थी

अब हम बन्दी हैं।

 

(वह मध्यप्रदेश की एक जेल में दस माह से बन्द थी)    

 
 
 
 
 

Monday, May 14, 2012

सुरेश चन्द्र श्रीवास्तव की स्त्री विमर्ष पर आधारित कुछ रचनायें

स्त्री अवाँछित हो गयी है क्या? अवांछित हो गयी है तो स्त्री देह की नुमाइश पर खड़े बाज़ार के प्रति इतनी लालायित क्यों है दुनिया? क्या स्त्री का अस्तित्व  उपभोग की परिधा में जकड़ दिया गया है? ....आख़िर क्यों स्त्रीभ्रूण इतना अवांछित हो गया है कि उसे विज्ञान से भी भय हो गया है? ...ये कुछ प्रश्न हैं ..ज्वलंत प्रश्न जिनके उत्तर खोजने के लिये समाज को झिंझोड़ने का प्रयास कर रहे हैं सुरेश चन्द्र श्रीवास्तव। 

       1-     बिटिया का प्रश्न


गर्भ में आते ही
दी थी, उसने दस्तक
और धीरे से कहा था- माँ!
मैं देखना चाहती हूँ दुनिया,
मुझे बाहर आने से मत रोकना,
मैं घातक हथियारों से डरती हूँ,
तमंचों की आवाज़ भी
मुझे सहमा जाती है
एक अनजाने भय की सिहरन
कौंध जाती है, मेरे
कायानुमा मांस के लोथड़े में।
यह कैसा समय आ गया है
कि तुम्हारे गर्भ में रहकर भी, मैं
आतंकित हूँ ...असुरक्षित हूँ
पर जब तक तुम्हारी ममता
मेरे साथ है
मैं भयमुक्त हूँ।
जानती हूँ मैं
बाहर की दुनिया बड़ी निर्मम है
व्ह प्रेरित करेगी तुम्हें
ममता का त्याग करने को
तरह-तरह के प्रलोभन देगी
वंश और पीढ़ियों का वास्ता देगी।
विज्ञान ने
लाँघकर अपनी सीमायें
तुम्हें यह बता दिया कि मैं “मैं” हूँ
वरना क्या तुम त्याग सकतीं
अपनी ममता?
कदापि नहीं माँ!
तुम तो ममता की मूर्ति हो,
क्या तुम
मुझमें अपना प्रतिबिम्ब नहीं देखतीं?
तुम्हें याद नहीं आता अपना बचपन ?
सोचो,
अगर तुम्हारी माँ ने भी
यही सोचा होता
जो तुम आज सोच रही हो
तो कहाँ होता तुम्हारा अस्तित्व?
और कहाँ होता तुम्हारे पास
यह सब कुछ सोचने का अधिकार?
तुम्हारी कोख में
केवल मैं नहीं
एक समुद्र है जिसके वृत्त में
अनेकानेक चीजें सप्राण हो रही हैं।
क्या तुम महसूस नहीं करतीं
एक पूरी पृथ्वी रेंगती है
तुम्हारे गर्भ में?
माँ! परम तत्वों की
स्वायत्तता को स्वीकारो
मुझे मत मारो....
मुझे मत मारो....।

     2-    छद्म नाम.....
एक लड़की हो
खेलो
गुड्डे-गुड़ियों के खेल,
झूठ-मूठ का
खाना बनाने-खिलाने का खेल।
तुम्हें नहीं चाहिये
चाबी से उड़ने वाला हेलीकॉप्टर
पटरी पर दौड़ने वाली रेलगाड़ियाँ।
भला
खिलौना कहीं खिलौनों से खेलता है?
तुम बहुत ज़ल्दी बड़ी हो जाओगी
क्योंकि
सबके सब देख रहे हैं तुम्हारा बढ़ना
चिंटू-पिंटू से लेकर
मन्दिर का पुजारी तक।
तुम नहीं जानतीं
मद्रास के समुद्री किनारों की तरह
कटे-फटे होने के बावज़ूद
तुम सिंगापुर की तरह सुन्दर हो।
बहुत ज़ल्दी ही
तुम्हारा भी मूल निर्धारित कर लिया जायेगा।
बहुत बड़ा होगा तुम्हारा बाज़ार
जैसा कि होता है
एक सुन्दर मॉडल का बाज़ार
राइट या लेफ़्ट क्लिक करके
लोग ले लेंगे तुम्हें अपनी मेमोरी में
तुम तितली से फूल हो जाओगी
और इस तरह धीरे-धीरे बहने वाली हवा
अंततः आँधी बन जायेगी
इससे पहले कि सूरज तपे
और पिघलने लगे तुम्हारे ऊपर का आसमान
क्यों नहीं रख लेतीं तुम
अपना कोई छद्म नाम
जैसे कि प्रेम चन्द
या कुछ और..... 



  3-      ज़रूर पूछेगी बेटी
कल पूछेगी बेटी
ज़रूर पूछेगी
क्या कर रहे थी आप
उस वक़्त
जब छीनी जा रही थी
मेरे हाथ से किताब
और थमा दी गयी थी
एक झाड़ू.....
गोबर से भरा एक तबेला।
यह भी पूछेगी बेटी, 
जब असमय ही
बूढ़ी बनायी जा रही थी मैं
और वह
अपनी जीत पर ठहाके लगा रहा था
तब पिता होने का फ़र्ज़
किस हद तक निभाया था आपने ?
ज़रूर पूछेगी बेटी,
जब अस्त हो रहा था
मेरी उम्मीदों का सूरज     
और
फेकी जा रही थी मैं
किसी रद्दी की टोकरी में
एक हिंसक युद्ध के बाद
तब
क्या कर रहे थे वे
जिन्होंने उठा रखा है बीड़ा
सब कुछ बदल देने का
शायद....नारे लगा रहे होंगे
किसी सार्वजनिक मंच पर
“नारी पढ़ेगी विकास गढ़ेगी........
नारी पढ़ेगी विकास गढ़ेगी”