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Tuesday, April 17, 2012

ऋषिका दुबे फ़ार्मेसी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं। कागज़ को काला करना इनका शौक तो नहीं पर ज़रूरत अवश्य है.... ज़िन्दगी के खट्टे-मीठे अनुभवों की रंगोली सजाना अच्छा लगता है। ज़िन्दगी की आँख मिचौली हैरान करती है इन्हें। आज प्रस्तुत है उनकी यह रचना -    
एक साल बाद

सुन रही हूँ ....................
दरवाज़े पर दस्तक दी है किसी ने
कौन होगा ?
कहीं ज़िन्दगी तो नहीं ?
याद करती हूँ.....
हाथ थामे
घूमा करते थे हम बाज़ार में
अचानक हाथ छूट गये और कब
आगे निकल आयी मैं
पता ही नहीं चला।
ये अकेलेपन की उदासी थी
लम्बा वक़्त लग गया
इससे जूझने में।
साल बीत गया, हमें
बाज़ार घूमे हुये।
उदासी भी कोई ऐसी-वैसी नहीं थी
दिन सुबकते रहे
रातें सिसकती रहीं
लम्हों की रेत हाथों से खिसकती रही
पर ज़िन्दगी ने, देखो
हार नहीं मानी,
गली-गली नाम पूछती रही मेरा;
चेहरों की भीड़ में
चेहरा ढ़ूँढ़ती रही मेरा।
दरवाज़े पर रखे हाथ
काँप रहे हैं मेरे
उसकी आँखों में मेरी तलाश की बेचैनी
कोई भी पढ़ सकता था।
एक दिन, गहरी साँस ले
कुछ हिम्मत जुटाई
खोल दिये उदासी भरे तहख़ाने के दरवाज़े
और ये क्या!!!
यहाँ तो तुम हो,
मदमस्त हवाओं की मुस्कान
होठों पर सजाये
खिलते हुये चाँद की चमक
आँखों में बसाये
बाहों में पूरे जहां की खुशियाँ हैं तुम्हारे
और चेहरे पर स्वर्णिम भविष्य का तेज़।
सोचा था,
ज़िन्दगी मुझे ढ़ूँढ़ती होगी दर-दर
पर ये तो तुम थे
जो उसे मेरे लिये फिर ढ़ूँढ़ लाये
एक साल बाद....
फिर ज़िन्दा-ज़िन्दा हूँ मैं।            

Friday, March 30, 2012

जयंत कुमार थोरात की एक हज़ल


इंसान् हो, इंसान की पहचान रख़ना,
संग अपने हिन्दू और मुस्लमान रख़ना।


राहत मयस्सर करने मुसाफ़िरों को धूप से,
मकान में ज़रूर अपने एक दालान रखना।


खो न जाओ जहां की बेहिसाब भीड़ में तुम,
लाज़िमी है अपनी अलग पहचान रखना।


हर्फ़ों के ज़ख़्म ख़ंज़र से भी गहरे होते हैं,
मिश्री से भी मीठी अपनी ज़ुबान रखना।


बुलन्दी आसमां की कम नज़र आने लगे,
ऊँचा इतना तुम अपना ईमान रहना।


हर ख़ता की सज़ा ख़ुद ही मिलती है,
किसी के लिये न दिल में इंतकाम रखना।


भूलने में आजकल वक़्त कहाँ लगता है,
दिल मे यादों के कुछ मेहमान रखना।


उम्र भर ख़ुदा को न किया याद, कोई बात नहीं
आख़िरी वक़्त अपने संग गीता या कुरान रखना।
  

Tuesday, March 20, 2012

लड़कियाँ - जयंत कुमार थोरात


घर में, आँगन के फूलों सी खिलती हैं लड़कियाँ,
नसीब वालों के ही घर में पलती हैं लड़कियाँ

ख़ुदा की भेजी पाक नेमत सी नज़र आती हैं,
घर के दालानों में जब टहलती हैं लड़कियाँ

हवा के झोंकों से झूमती कलियों सी नज़र आती हैं,
अपनी किसी ख़्वाहिश पर जब मचलती हैं लड़कियाँ

जब तक क़रीब हैं, रखो ख़ुशियों से सराबोर इन्हें,
जल्द ही नैहर के बाहर निकलती हैं लड़कियाँ

हर हाल में जी लेना इनकी फ़ितरत में है शामिल,
सुख-दुःख के साँचे में जल्द ही ढ़लती हैं लड़कियाँ

कदम इनके किसी इबादत से कमतर तो नहीं 'थोरात',
खिलखिलाती हैं जब-जब, लोबान सी महकती हैं लड़कियाँ

नज़ाकत को इनकी कमज़ोरी समझने वालो,
अपनी पे आ जायें तो अंगारों सी दहकती हैं लड़कियाँ

सरस्वती हैं, लक्ष्मी हैं, कल्याणी हैं मगर फिर भी
ज़मीं पे आने से पहले ही क़त्ल हो जाती हैं लड़कियाँ

Saturday, September 17, 2011

हम तो आदिवासी थे, आदिवासी हैं और आदिवासी रहेंगे.....पद्मश्री डॉ. पुखराज बाफना



जिनके पास कटु सत्य से सामना करने का साहस है...........ऐसे सभी सुधीजन आदर के साथ आमंत्रित हैं -
राजनांदगाँव निवासी बालरोगविशेषज्ञ पद्मश्री डॉ. पुखराज बाफना जी की इस रचना का सामना करने के लिए. विकास के तमाम खोखले दावों ....अनेक योजनाओं .....और  बेशुमार प्रचार के तामझाम से दूर ....प्रस्तुत है बस्तर की हकीकत .......जो दिल और दिमाग दोनों को झकझोरने के लिए काफी है -       डॉक्टर कौशलेन्द्र 

हमारी तहजीब को तुमने विज्ञापनों में उतारा
हमारी नैसर्गिक परम्पराओं ने तुम्हारा मनोरंजन संवारा / 
हमारी संस्कृति, तुम्हारी शादी में नाचती-बजाती है
हमारी जांगरतोड़ मेहनत तुम्हारे आलीशान घरों में कम मजदूरी पाती है /
हमारी कलाकृतियाँ, तुम्हारे ड्राइंग रूम की शोभा बनती हैं
हमारी सल्फी, अब तुम्हारे मेहमानों के लिए भी छनती है /
हमारे लिए नमक भी तुम्हारी राजनीति का सौदा हो गयी 
आदिवासी होने का सर्टिफिकेट मुख्यमंत्री का ओहदा हो गयी /
जंगली उत्पाद तुम्हारे इम्पोर्ट- एक्सपोर्ट के धंधे बन गए 
हमारी बदौलत न जाने कितनों के महल तन गए /
हमारे अर्धनग्न / आधे पहनावे तुम्हारी दर्शनीय वस्तु हो गयी
ओ शहरी जीव! तुमसे मिलकर हमारी तो ओरिजिनलिटी खो गयी /

हमारे पर्वतों, खदानों के लौह अयस्क तुम्हारे उद्योग बन गए
हम भूखे रहे, हमारी जड़ी-बूटियाँ तुम्हारे उत्तम भोग बन गए /
हमारी निः स्वार्थता और भोलेपन का कितना दोहन करोगे ?
क्या अब हमारी लंगोटी का भी चीर हरण करोगे ??
हमारी वेशभूषा पहन कर तुम्हारे नेता तस्वीरें खिंचवाते हैं
बिंदास अल्हड़पन की फोटो काले बाज़ार में बिकवाते हैं /
हमारी संस्कृति को.... सेहत को ....तुमने दूषित किया है
सच मानो तो हमारे शोषण ने तुम्हें पोषित किया है /
नकली आदिवासी का ढोंग करते तुम्हें शर्म नहीं आती ?
अब तो तुम्हारी गंध भी हमारे नथुनों को नहीं भाती /
हम आज भी कुपोषित हैं, शोषित हैं ...पीड़ित हैं 
पर अपनी संस्कृति पर आज भी गर्वित हैं /

हम चुप हैं अपनी पहचान खो जाने के डर से
तुमने कहाँ देखे अभी हमारे टंगिये और फरसे /
हमारे सम्पूर्ण विकास के सारे पैसे बिचौलिए खा जाते हैं
काम हो न हो, पेपरों में आंकड़े आ जाते हैं /
कभी झांको तो सही हमारे बच्चों को टीका लगा या नहीं ?
उनका आवंटित मध्याह्न भोजन उनके अंग लगा या नहीं ??
रक्ताल्प पीड़ित किशोरियाँ कितने अपरिपक्व बच्चे जनती हैं ?
कितने नवजातों की कितनी सालगिरह मनती है ??
तुम्हारे शोधपत्र और आंकड़ों के ज़खीरे हमारा पेट नहीं भरते
तुम्हारी सियासत हमारे नून-तेल-लकड़ी का इंतज़ाम नहीं करते /
अपनी संस्कृति को ज़िंदा रखते हुए बेहतर ज़िन्दगी जी सकें 
ऐसा कुछ कर सकते हो तो बोलो ....?
वरना जैसे कई आये-गए , तुम भी अपने रास्ते हो लो /
जिनके कान हों और जो सुन सकते हों उनसे ही कहेंगे
हम आदिवासी थे, आदिवासी हैं और आदिवासी ही रहेंगे .....

 









Monday, May 09, 2011

प्रणाली .....रोशन वर्मा


हम मध्याह्न भोजन बाँट रहे हैं 
जनता की पीढ़ियाँ तैयार कर रहे हैं   
पैदा होते ही  
उन्हें कटोरे की जगह  
थाली थमा रहे हैं  
आखिर हमारी पीढियां  
हुकूमत करेंगी किस पर ! ....        -डॉक्टर कौशलेन्द्र 

पूरी तरह ......
हटा दो परीक्षाएं 
किताबें और कापियां 
कलम और साधना....... 
- ये सब, 
मनोविज्ञान कहता है कि.....  
तनाव पैदा करती हैं .
हमारे नौनिहाल 
उनका कोमल है तन-मन
बुद्धि विकास
आज़ादी से हो ..
वे कमजोर हैं 
तन-मन और हाजिरी में 
उन्हें भोजन दो 
तन के लिए 
वे कतार में खड़े हैं 
थाली-कटोरी लेकर  
अभ्यस्त हो चले हैं.
उन्हें खुला आनंद दो 
मन के लिए 
वे खाली वक़्त पर 
आये हैं / मज़बूरी में 
हल्का-फुल्का माहौल 
तीव्र बुद्धि विकास के लिए ज़रूरी है.

स्थायी ज्ञान और समझ के लिए 
कडा परिश्रम क्यों  ?
स्मरण /प्रत्यास्मरण / अभ्यास क्यों ?
श्रेष्ठता का संघर्ष क्यों ?
जीवन में स्पर्धा कहाँ है ?
आगे कोई तनाव नहीं  
तो श्रम और साधना क्यों ?
विद्या की आराधना क्यों ?
जीवन आनंदमय है 
मधुमय ,सरस और रंगीन  
जीवन परीक्षा नहीं 
तो आगे असफलता कैसी 
मधुकर ! 
यहाँ कोई परीक्षा नहीं 
कोई अड़चन नहीं  
तुम्हारा अधिकार है 
यहाँ उत्तीर्ण होना  
और आगे 
मृदुल, कोमल, सुखद जीवन है 
तुम तो भोजन करो.  

Monday, March 14, 2011

दावे ..अपने-अपने - रोशन वर्मा


हुआ जलजला / घिरा अन्धेरा / किसका दावा / कितना सच था ?
किसका क्या था ...../ किसका कितना था...../ धरा रह गया सबका दावा.     - कौशलेन्द्र 

१-
ये घर मेरा है 
ये .......
यहाँ से वहां तक 
कागजात भी हैं मेरे पास 
दिखाऊँ ?

२-
इस घर के 
जालीदार, लोहे के 
बड़े से गेट के भीतर से 
भौंकता है 
एक बड़ा सा 
डरावना सा कुत्ता ........
कोई आना नहीं 
ये घर मेरा है.

३-
इसी घर के 
छज्जों पर ......
रोशनदानों के पीछे ......
बनाती है हर साल 
एक चिड़िया 
अपना घोसला
ये घर मेरा है 
न जाने कितनी पीढियां जन्मीं हैं 
इसी घर में 
कोई और कैसे रह सकता है 
मेरे पुश्तैनी घर में ?

४-
साँप और चूहे
छछूंदर और तिलचट्टे 
छिपकली और बिच्छू 
चीटियाँ और दीमक 
आँगन में उगे अमरूद 
पौधे और फूल
कोई किराए से नहीं रहता यहाँ 
सबका मालिकाना हक़ है 
यहाँ तक कि अदृश्य कीटों का भी
जन गणना में किसे बताऊँ इसका मालिक ?
कोई एक हो तो बताऊँ !

५-.
चले आते हैं सब 
बारी-बारी
जो आता है एक बार 
फिर नहीं जाता 
फिर आयेगा कोई..... 
अब ....... ये घर मेरा है
आखिर किसका है ये घर 
कब तक और कितना 
जापान में आये सूनामी ने 
बाध्य कर दिया है मुझे  
यह सोचने के लिए 
कि आखिर किसका है ये घर 
कब तक .......और कितना ......!
दावा किसका सच है 
और कितना ! 



Friday, March 04, 2011

मैं ज़िंदा हूँ ......रोशन वर्मा

अध्यापक हूँ ........शायद पुराने युग के किसी आचार्य की आत्मा हूँ ....चारो ओर के तमस से छटपटा रहा हूँ .......ये कैसी बेकली है .....प्राण निकलने-निकलने को होते हैं .....पर निकलते नहीं ......और इसीलिये मैं अभी तक ज़िंदा हूँ   - कौशलेन्द्र 

मूल्य छूट रहे हैं 
मर्यादाएं टूट रही हैं 
छोटे-बड़े का लिहाज़ 
सब खो रहा है आज
ज़माना सो रहा है 
..........................ओर मैं ज़िंदा हूँ .

विद्या के नाम पर 
गली कूंचों के बदबूदार घर 
स्कूल बन बैठे 
नामुराद सौदागर ही 
शिक्षादूत और अध्यापक बन बैठे 
विद्या की देवी रो रही है 
...................और मैं ज़िंदा हूँ 

जो चली है लहर, उसकी धार से 
चपन  घर-घर बीमार हो रहा है 
सुनते हैं ...हर दवा में घुला है ज़हर 
पीढियां होश खो रही हैं 
..................और मैं ज़िंदा हूँ.

श्वेत पर श्याम की दीवार 
रंग के साए में हर बार 
मुखौटा साज़ कर मोहरे
बने फिरते चर्चित चेहरे 
आवाज़ खासों की बुलंद है 
आम की खामोश है 
विधवा सा लगता है देश 
सारा लोक रो रहा है 
..........................और मैं ज़िंदा हूँ.

काठ मार गया है मुझे 
देखते-देखते दोगले जीवन का सच. 
सत्य अब झूठ का आँचल 
पकड़ कर चल निकला पल-पल
न्याय की देवी की आँखों से पट्टी ले गया कोई 
एक पलड़ा झुका ही रहता हर दम 
न्याय खो रहा है 
.............बेशर्मी की हद है फिर भी मैं ज़िंदा हूँ .